दर्शनीय पूर्वोत्तर
साइकिल, मोटर साइकिल, कार, जीप, बोरा, गट्ठर, टोकरी, बच्चे, बूढ़े, युवक, युवतियां और ना जाने क्या-क्या लद रहा था उस विशालकाय बोट पर। ऐसा लग रहा था जैसे की यह बोट भी महान भारत देश की तरह विभिन्न प्रांत-भाषा-जाती-पंथ के लोगों को अपने में समाहित करने में सक्षम है। आपको शायद टाइटैनिक का जहाज याद आ गया हो। लेकिन हम रुख कर रहे थे दुनिया के सबसे बड़े रिवर आइलैंड 'माजुली' की तरफ। यह कुदरत का पक्षपात जैसा प्रतीत होता है कि दुनिया का सबसे बड़ा रिवर आइलैंड 'माजुली' और दुनिया का सबसे छोटा रिवर आइलैंड 'उमानंद' दोनों ही असम के ब्रह्मपुत्र नदी में स्थित हैं। निमाटी घाट से माजुली का 3 घंटे का सफ़र कब शुरू हुआ और कब समाप्त ये पता ही नहीं चला। इतने सुन्दर दृश्य, इतना शांत वातावरण, अविरत बहती ब्रह्पुत्र की धारा और इसके रोज के साथी - माझी और ग्रामवासी। ये आश्चर्य ही था कि इतने सुन्दर स्थान पर कोई पर्यटक नहीं था। डिस्कवरी चैनल वाले सुदूर अन्टार्क्टिका के बर्फीले स्थानों तक पहुँच जाते हैं फिर यहाँ इतना क्यों नहीं आते? क्या भारत के ही लोग यहाँ घूमने आते हैं? कुछ उत्सुक लोगों के अलावा क्या आम लोग जानते है की भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में किस राज्य में क्या है देखने लायक? क्या वो पूर्वोत्तर के हर राज्य के किसी एक दर्शनीय स्थल का नाम भी बता सकते हैं, क्या लोग ये जानते हैं कि मणिपुर के लोग कृष्ण भक्त हैं ना कि किसी कोरियन भगवान् की पूजा करते हैं ? - ऐसे बहुत से प्रश्न एक के बाद एक मेरे अन्दर उठने लगे। फिर मन को एक सुकून भी मिला की अच्छा ही है कि बाहरी लोग यहाँ कम ही आते हैं जिसकी वजह से ये अभी तक अपनी प्रकृति, पर्यावरण, संस्कृति और परम्पराओं को बचा कर रख पाए हैं। इनके चेहरे पर जो मुस्कराहट है वो स्वाभाविक है, इनका आतिथ्य वास्तविक है, इनका प्रेम शुद्ध व निश्छल है। पर्यटन विकास के नाम पर देश भर में पनप रहे बाज़ार में इन चीजों का घोर अभाव है। हर मुस्कराहट के पीछे कोई स्वार्थ नजर आता है, हर आग्रह एक संशय पैदा करता है। एकरूपता अभियान ने तो स्थान-विशेषों की अद्वितीयता और विशेषता ही समाप्त कर दी है। कितना हास्यास्पद लगता है जब कोई पहली बार कृष्ण के गोकुल जाए और मन में कल्पना करे की वहाँ चारों ओर वन होंगे, गायें विचरण करती होंगी, मनमोहक और मनोरम दृश्य होगा। और जब वहाँ पहुंचे तो चारों तरफ मोबाइल, साबुन, शैम्पू आदि के प्रचार के होर्डिंग्स लगे मिले। सड़को पर ट्रैफिक जाम और हॉर्न की आवाज। खाने के लिए अमृतसर में बम्बई की भेल और बम्बई में अमृतसरी कुलचा। रुकने के लिए आपका जाना-पहचाना 3 स्टार होटल विथ वेस्टर्न कमोड । पारंपरिक वेश तो जैसे केवल किसी कार्यक्रम में देखने को मिलते हैं या फिर किसी प्रदर्शनी में। फिर क्या फर्क पड़ता है कि आप महाराष्ट्र के किसी क्षेत्र में हैं या पंजाब के शहर में? शायद यही कारण है कि राजस्थान के अन्दर होते हुए भी पर्यटकों को राजस्थानी संस्कृति को देखने और समझने के लिए 'चोखी ढाणी' जैसे व्यावसायिक कृत्रिम गाँव जाना पड़ता है।
असम का माजुली द्वीप वैष्णव सम्प्रदाय का प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ के सत्रों (मठों) में रह रहे भक्त पूरा जीवन ही सादगी के साथ साधना में लगा देते हैं। पूजा-अर्चना के साथ-साथ सत्रीय डांस में वे निपुण होते हैं। माजुली द्वीप पर लगभग डेढ़ लाख लोग रहते हैं। हर घर में बांकी कुछ हो न हो, नाव जरूर होती है। क्योंकि बाढ़ आने पर पूरा द्वीप ही पानी में डूब जाता है। कईं दिनों तक नावें ही लोगों का घर बनी रहती है। जनवरी में जब असम के खेतों में फसल पकती है तो बिहू उत्सव हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। पूरा असम रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों से सज जाता है। लोग जगह-जगह बिहू नृत्य कर के अपनी ख़ुशी का इज़हार करते हैं और जीवन का आनंद लेते हैं। इस आनंद पर्व को मनाने के लिए ना तो किसी मंच की आवश्यकता होती है, और न ही कोई टिकट लगता है देखने का। मन के अन्दर की प्रसन्नता मित्रों के साथ अपने आप बाहर आती है, और सब झूमने लगते हैं। मेघालय का चेरापूंजी तो अविरत वर्षा के लिए प्रसिद्ध है। विश्व में सबसे अधिक वर्षा चेरापूंजी में होती है। यह अपने प्राकृतिक सौंदर्य और पहाड़ों से गिरते झरनों के लिए भी खासा जाना जाता है। साक्षात शिव से संवाद करते अरुणाचल प्रदेश के शांत और ऊंचे पर्वत, दूर तक फैला प्राकृतिक दृश्य और उसके बीच कहीं कोई बौद्ध भिक्षु अपने मठ (मोनास्ट्री) की तरफ जाते हुए, अकस्मात् ही बाहर से आये किसी पर्यटक को अपनी ओर आकर्षित करता है और पूछता है की तुम जिस जीवन की दौड़ में सुबह से शाम तक जी रहे हो आखिर उसका उद्देश्य क्या है? उस समय निरुत्तर मन, एक बार को सब कुछ छोड़छाड़ कर वहीँ बस जाने का विचार हर किसी के मन में उठता अवश्य है। 14 हज़ार फुट की ऊंचाई पर बसे "सेला पास" से जब गाडी गुजरती है तो वहाँ की बर्फीली हवा के सामने सर्दी के तमाम इंतजाम बेकार लगते हैं। वहाँ की शीत लहर कर्ण के कवच को भी चीर कर उसके सीने में अपनी शीतलता का एहसास ज़रूर करवाती है लेकिन जब थोड़ी ही दूर आगे निकलने पर "जसवंत गढ़ युद्ध स्मारक" पर तैनात दक्षिण भारत का निवासी कोई भारतीय सेना का सैनिक अपनी चौड़ी छाती के साथ यहाँ आने वालों को 1962 के युद्ध की घटना बयान करता है तो पूरा शरीर ऊर्जा और ऊष्मा से भर उठता है। मन में स्वाभाविक रूप से देश के इन प्रहरियों के लिए कृतज्ञता का भाव जागता है।
पूर्वोत्तर की यात्रा में यूँ तो भाषा एक समस्या के रूप में नजर आती है, परन्तु यही बाधा एक आनंद भी प्रदान करती है। जब आपको अपनी बात समझाने के लिए कुछ अधिक प्रयास करने होते हैं, तब आपकी सहभागिता स्थानीय लोगों के साथ बढ़ जाती है। उनकी बातों को समझने के लिए उनमे विशेष रुचि लेनी पड़ती है। पूर्वोत्तर को समझने के लिए भाषा से अधिक भाव सहायक होते हैं।
लम्बे समय तक अलगाव व अनदेखी ने पूर्वोत्तर राज्यों के विकास को अवश्य ही बाधित किया है परन्तु इसके प्राणों की रक्षा का कारण भी इसका एकांत ही रहा है। पर्यटन विकास की योजना बनाते समय इन बातों पर विशेष ध्यान देना होगा कि किसी भी कीमत पर पूर्वोत्तर अपनी स्वाभाविकता को न खो दे। इसकी संस्कृति, शुद्ध रूप से बनी रहे। मैं अपने आप को उन चंद सौभाग्यशाली लोगों में पाता हूँ जिन्होंने पूर्वोत्तर को देखने और समझने का अवसर पाया है। ईश्वर आपको भी जीवन में कम से कम एक बार तो यह अवसर अवश्य ही दे।