शनिवार, 9 जुलाई 2011

तवांग (Arunachal)

चलते-चलते अचानक हमारी बस एक फ़िल्मी सीन की तरह ऐसी जगह जाकर बंद हो गई जहां ठीक बस के ऊपर एक विशाल पत्थर आत्मघाती हमले के लिए तैयार था लेकिन उसके आसपास की पर्वत श्रृंखलाओं ने जैसे उसको कमर से पकड़ रखा हो और हमें कह रहा हो की "जल्दी से यहाँ से आगे निकल जाओ...."
विश्व संघ शिविर के बाद कीनिया के 20 लोगों के साथ पूर्वोत्तर को ठीक से देखने का सौभाग्य मिला. 4 -5 लोगों को छोड़कर लगभग सभी 50 वर्ष से अधिक आयुवर्ग के थे और उनमे 70 पार कर चुके किरण भाई हम सभी के लिए विशेष प्रेरणा थे. इस उम्र में जनवरी के महीने में 23 दिन की पूर्वोत्तर यात्रा, यह एक बहुत बड़ी चुनौती थी. यात्रा में बहुत सारी अनिश्चितता थी लेकिन एक मंत्र "Expect Unexpected " सभी ने रट लिया था और हर चुनौती को स्वीकार करने के लिए कमर कस रखी थी.
अरुणाचल के बोमडिला से तवांग जाने में लगभग पूरा दिन लग जाता है. निश्चित कार्यक्रम के अनुसार हमें सुबह जल्दी ही बोमडिला से निकलना था लेकिन ड्राईवर सवेरे उठकर नया टायर लेने चला गया. क्योंकि बीते कल जब हम गुवाहाटी से भालुकपोंग होते हुए बोमडिला आ रहे थे तो पहाड़ी रास्ते में एक जगह हमारी बस का टायर फट गया था, जिसके कारण हम रात लगभग 10 बजे बोमडिला पहुंचे. चारों तरफ सन्नाटा. अरुणाचल में रात 10 बजे का मतलब होता है आधी रात. भारत में सूर्य की सबसे पहली किरण को आलिंगन करने
का सौभाग्य अरुणाचल को मिलता है इसीलिये शाम भी जल्दी होती है. बोमडिला में हमारा रात्री निवास Monastery के गेस्ट हाउस में था.

आज मुझे भारत में सूर्यदेव का स्वागत करना था इसलिए सुबह पौने चार बजे मै अपने कमरे से बाहर निकल गया. एक तरफ बोमडिला और जनवरी महीने की संयुक्त शीत-शक्तियां तो दूसरी तरफ मेरे thermal wears , ऊनी कपडे, jacket की सेना ने मोर्चा संभाल रखा था. थोड़ी सी चढ़ाई चढ़ने के बाद मै Monastery पहुँच गया. मेरी आँखों के सामने दूर तक फैले हिमालय की पहाड़ियां थी और चारों तरफ असीम शांति. बहुत से बौद्ध भिक्षु अपनी साधना में लीन थे. उनमे कुछ तो उम्र में बहुत छोटे लगते थे. बौद्ध परिवारों में अपने बच्चों को भिक्षु बनाने की परंपरा रही है. Monastery को बड़ी ही सुन्दरता से सजाया हुआ था. जगह-जगह तिब्बती चिह्न dragon बने हुए थे.
टायर बदलने में काफी समय लग गया और दोपहर 12 बजे हमने तवांग के लिए प्रस्थान किया. रास्ते में जगह-जगह तिब्बती पारंपरिक पताकाएं लहराती हुई दिख जाती थी. प्राकृतिक दृश्य इतने सुन्दर और मनमोहक लग रहे थे की हर मोड़ पर रुकने का मन करता था. वहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता में एक आकर्षण था, एक आमंत्रण था. लेकिन वहाँ की सड़कें!ड्राईवर की क्या मजाल की एक सेकण्ड भी उसकी आँख लग जाए. सडकों में गड्ढ़े थे या गड्ढ़ों में सड़कें ये तय कर पाना मुश्किल था. पथरीले पहाड़, land slide होना उन रास्तों में रोज की बात है. Border Road Organisations (BRO) के बोर्ड वहाँ जगह-जगह लगे थे. और उनकी सतर्कता और कर्मठता के कारण ही उस क्षेत्र में जाना संभव हो पता है. जब हम अखबारों में पढ़ते हैं की चीन ने अपनी सीमा तक 8 लेन की सड़कें और एअरपोर्ट बना लिए हैं और उनके लड़ाकू जहाज चंद मिनटों में सीमा तक पहुचने में सक्षम है तो भारत की सीमा सुरक्षा विषय की गंभीरता का आभास होता है. चलते-चलते हमारी बस बंद हो गई. सामने 15 मीटर की दूरी पर एक बहुत बड़ा सा पत्थर सड़क की किनारे था जो कुछ दिन पहले गिरा होगा और उसको बुलडोजर से किनारे कर दिया था ताकि गाड़ियां आ-जा सके. ड्राईवर ने बताया की गाडी स्टार्ट नहीं हो रही. बाहर निकलने पर देखा तो हमारी बस के ठीक ऊपर जो पहाड़ी थी उस पर से मिटटी सरक-सरक के गिर रही थी और कभी भी कोई बड़ा पत्थर गिर सकता था. जब 2 -4 मिनट तक गाडी स्टार्ट नहीं हुई तो मैंने सभी को गाडी से उतारकर थोडा आगे सुरक्षित स्थान पर जाने को कहा. हमारी गाड़ी फसने के कारण रास्ता बंद हो गया था और पीछे और भी कुछ गाड़ियां आ गई थी. कुछ लोगों को बुलाकर हमने गाड़ी में धक्का लगाने को कहा ताकि बस को इस danger point से थोडा आगे ले जाया जाए. उनके धक्के से भी कोई बात नहीं बनी. गाड़ी कीचड में फंसी हुई थी. तभी एक आर्मी का ऑफिसर आया और उसने स्थिति देखकर अपने जवानो को आवाज दी. फिर क्या था, भारतीय सेना के सामने कौन सी समस्या टिक सकती थी. एक ही झटके में गाड़ी किनारे लग गई, थोड़ी राहत मिली. हम दिरांग से 15 किलोमीटर पहले फंसे हुए थे. दिरांग एक छोटा सा कस्बा है. 1 घंटे की जद्दोजहद के बाद भी सफलता नहीं मिली. हमारे साथ में एक छोटी गाड़ी तवेरा भी थी. मै वो गाड़ी लेकर दिरांग में मेकेनिक ढूँढने निकल चला. मुश्किल से 1-2 किलोमीटर गया की आगे Land slide के कारण रास्ता बंद था और BRO रास्ता साफ़ करने में लगी हुई थी. ये तय था की आज अब तवांग नहीं पहुँच सकते. कहाँ जायेंगे, रात में कितनी सर्दी होगी, सभी को भूख लगी होगी, किसको फ़ोन किया जाए, ऐसे बहुत से प्रश्न मेरे दिमाग में चल रहे थे और मैंने कुछ लोगों को emergency arrangement के लिए फ़ोन भी कर दिए थे. 2 घंटे के बाद मै दिरांग में मेकेनिक के पास पंहुचा. गंदे से कपड़ों में सने दाढ़ी वाले मेकेनिक में मुझे इस समय भगवान् नजर आ रहे थे. वो एक दूसरी गाड़ी को ठीक करने में लगा था. थोडा समय लगना था इसलिए मै होटल ढूँढने निकल गया. एक होटल में गया तो पता चला की वहाँ केवल 4 ही कमरे हैं. आखिरकार एक lodge मिला जिसका नाम था 'होटल मून' और मैंने उसको बुक कर लिया. मेकेनिक को लेकर मै अपनी बस के पास पहुंचा तो लोगों ने बताया की मेरे जाने के बाद एक और लैंड slide हुआ जो उन्होंने जीवन में पहली बार देखा. बस का फ़िल्टर फूट गया था. मेकेनिक ने बस की कुछ bypass surgery की और आखिरकार बस ठीक हुई. रात हमने दिरांग में बिताई. सुबह की पहली किरण के साथ हमारा काफिला तवांग की तरफ बढ़ चला. उत्तुंग हिमालय क्षेत्र, कल्पनाओं को मात देती सुन्दरता, कितनी शान्ति. हम सेला पास पहुँच गए थे. यह स्थान समुद्र तल से 13000 फीट की ऊंचाई पर है. चीन के साथ 1962 के युद्ध में अरुणाचल की एक बहादुर लड़की 'सेला' ने भारतीय सैनिकों की खूब मदद की थी. उसीके सम्मान में उसके नाम पर इस दर्रे का नाम रखा गया है. सेला दर्रा पार करते ही वहाँ एक बहुत ही सुन्दर sella lake थी जिसके किनारों पर और बीच-बीच

में बर्फ जमे हुई थी. फोटो लेने के लिए हम वहीँ रुक गए. लेकिन बस से बाहर निकलते ही बर्फीली तेज हवा में जैसे खून जम गया हो. 2 मिनट से अधिक रुकने की हिम्मत नहीं हुई और सभी वापस गाड़ी में आ गए. काफिला बढ़ चला. अब जगह-जगह बर्फ से ढके पहाड़ मिल रहे थे. 15 किलोमीटर आगे जसवंतगढ़ वॉर मेमोरिअल था. 1962 में चीनी अतिक्रमण के समय गढ़वाल राइफल के वीर सिपाही जसवंत सिंह रावत ने अपने दो अन्य सिपाहियों की सहायता से चीन की सेना के साथ 72 घंटे तक निरंतर संघर्ष किया और रोक कर रखा. अंत में इसी जगह पर चीनी आक्रान्ताओं ने उसे फांसी दे दी. भारत सरकार ने उस महान योद्धा को 'महावीर चक्र' से सम्मानित किया. सैनिकों के लिए यह एक मंदिर है. तवांग की यात्रा इस मंदिर दर्शन के बिना अधूरी है. अँधेरा होते-होते हम तवांग पहुँच चुके थे.

सुबह सूर्योदय दर्शन के पश्चात हम तवांग monastery पहुंचे. यह भारत की सबसे बड़ी monastery है और छठे दलाई लामा का जन्मस्थान भी. इसलिए इसका बहुत अधिक महत्व है. देखने में बहुत ही अद्भुत और विशाल. उस भव्य और आकर्षक मंदिर में भगवान् बुद्ध की विशाल मूर्ती, चेहरे पर अप्रतिम शान्ति. वह क्षण याद आते ही पूरा दृश्य आँखों के आगे आ जाता है. बहुत बड़ी संख्या में बौद्ध भिक्षु यहाँ साधना करते हैं. अगले दिन हम तवांग से 15 किलोमीटर आगे Penga Ten Tso (PTSO) lake पहुंचे. हम अब भारत-चीन सीमा के काफी नजदीक थे. हमें बताया गया की जो पहाड़ियां हमें सामने दिख रही है उनके पार चीन है. यह झील चारों तरफ से बर्फ से ढकी पहाड़ियों से घिरी हुई थी और बहुत ही सुन्दर थी. पानी का रंग स्याह था और उसमे कहीं नीले बादलों की परछाईं तो कहीं बर्फीली पहाड़ियों की छटा मिल कर विभिन्न आकर्षक रूप बना रही थी. सभी ने बर्फ में खूब मस्ती की और एक दूसरे के ऊपर बर्फ के गोले फेंके. सबकी उम्र मानो घट गई हो. किसी ने उस बर्फ पर अपना नाम लिखा तो किसी ने चित्र बनाया. जब सभी थक चुके तो वापस गाड़ी में आकर बैठ गए. अब यहाँ से वापसी थी और पूर्वोत्तर के चार अन्य राज्यों में जाना था. शरीर तो वापस चल पड़ा लेकिन मन उन्ही बर्फीली पहाड़ियों में भटकता हुआ कभी सेला को ढूँढने लगा तो कभी जसवंत सिंह को...